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छाप तिलक सब छीनी रे .....

Ustad Nusrat Fateh Ali renders a qawwali, here. 

Logic and structured approach has its limitations. Things that are not explained by a structured approach are easily conveyed through a play, poetry or a song. When I watch a play or listen to a song, or read a poem, I am amazed by such a grasp of human emotions and feelings.

One more thing. If one wants to understand love, bhakti or even have a glimpse of these ideas, one needs a “feminine” heart. The all-conquering superman will lose out in this realm. That is why Bhakts and Sufis have visualised themselves as a love lorn female, completely immersed in the beloved.

खुसरो रैन सुहाग की, जो मैं जागी पी के संग। 

तन मोरा मन पिया का, जो दोनों एक ही रंग।। 

खुसरो दरिया प्रेम का जो उल्टी वाकी धार!

जो उबरा सो डूब गया; जो डूबा वो पार!!

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके……

(Translation: When I woke up after a blissful night with my beloved, I was a changed person. My body and heart of my lover were now connected. In other words, I lost my heart and now the heart of my beloved resides in my body.

The poet says that the flow of this river of love is unique, and its pattern is opposite to that of a conventional river. The person who immerses and drowns in it, ultimately goes through, while a person who tries to bypass it, actually misses the entire point. 
After meeting the lover all external achievements, qualifications, and rituals are of no use.)

Detailed Explanation:

The poet says: After a blissful time with the beloved, when I awoke, the feeling could not be expressed in words. Something changed within me. Externally I was the same, but from inside “I” was no more in control. I lost control. “My heart” is no longer mine. My beloved now guides me.

The poet further says that the ways of love are irrational. In the rational world, individuality and effort lead to success, but in this realm, losing “self”, losing “ego”, submission and surrender ensures that one realizes eternal bliss.

O lover only after meeting you, I have realized the uselessness of external rituals, embellishments, achievements, and honorifics. Now I no longer identify myself with my position or even this body. I have lost myself and gained you.   

So the level of identification with the beloved is to the extent there is no separation between lover and the loved (a third person may see two bodies, but the lover herself can see no separation).

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