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रसिक बलमा

https://www.youtube.com/watch?v=QF1lNr-LniI

रसिक बलमा, हाय दिल क्यों लगाया, तोसे दिल क्यों लगाया, जैसे रोग लगाया
जैसे रोग लगाया…रसिक बलमा…..


Amazing rendering by Lata ji. One of few songs where Mukhda and Antara both are riveting. Note the tenderness in the voice of Lataji as first Antara begins, signalling a woman in deep love. नायिका प्रेम में विवश, अपनी कारुणिक दशा का विवरण कर रही है.

(सूरत वो प्यारी प्यारी) - The hero is described as a fleeting lover (रसिक, possibly insincere), but she still recalls his handsome personality

हसरत जयपुरी लिखते हैं - " नेहा (स्नेह, अर्थात प्रेम) लगा के हारी"
प्रेम ही ऐसा अनोखा भाव है जहाँ "हार" को भी व्यक्ति मधुर भाव से स्वीकार लेता है, "मैं" का भाव पीछे हो जाता है, और प्रियतम ही सब कुछ हो जाता है. और भी कई भाव हैं जो शब्दातीत हैं.
अभी मेरी सुई अटक गयी है, और बार बार इसी गीत को सुने जा रहा हूँ.

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मुहाजिर नामा (मुन्नवर राणा ) Muhajir Nama - By Munawwar Rana

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं, तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं । कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है, कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं । नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में, पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं । अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी, वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं । जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है, वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं । यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद, हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं । हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है, हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं । हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है, अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं । सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे, दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं । हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं, अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं । गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब, इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं । हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए

आवत ही हरषै नहीं...(गोस्वामी तुलसीदास)

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह । तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।। अर्थ: जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो, वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो ।

मनुष्य और सर्प (कवि : श्री रामधारी सिंह दिनकर)

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